संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि हमारी परंपरा में राष्ट्र और धर्म अलग नहीं हैं। राष्ट्र का उद्देश्य धर्म है और धर्म राष्ट्र की सेवा के लिए है। दोनों आपस में जुड़े हुए हैं। अगर एक है तो दूसरा भी है, अगर एक नहीं है तो दूसरा भी नहीं हो सकता। जब राष्ट्र कमजोर होता है, तो धर्म पर खतरा आता है। जब धर्म का अभ्यास कमजोर होता है, तो राष्ट्र का पतन होता है। इसलिए दोनों को सही तरीके से एक साथ आगे ले जाना हमारी जिम्मेदारी है। जब पढ़ाई के प्रति समर्पित युवा छात्र इस ज्ञान परंपरा की रक्षा के लिए समय निकालते हैं, तो यह राष्ट्रीय कार्य भी है और धर्म का कार्य भी है।मोहन भागवत ने मुंबई में ऑल इंडिया विहार सेवा ग्रुप के 14वें वार्षिक सम्मेलन में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने समर्पण, राष्ट्र और धर्म को लेकर अपनी बात रखी। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि इन दो चीजों (राष्ट्र और धर्म) को व्यवहार में अपनाने की कोशिश करो। अगर आप इन्हें अपने कर्मों से दिखा सकते हो, तो वही काफी है। यह उपदेश देने की बात नहीं है लेकिन एक बार आप देखेंगे कि संघ में भी लाखों लोग बिना कुछ मांगे अपना समय और पैसा देश की सेवा में लगाते हैं।

