पुलिस के हत्थे चढ़े आरोपियों की पहचान कानपुर निवासी शाहजेब वारिस और सलमान के रूप में हुई है। पुलिस ने इनके कब्जे से 65 लाख 26 हजार रुपये नकद बरामद किए हैं। इसके अलावा दो मोबाइल फोन, तीन चेकबुक, दो ATM कार्ड, बैंक अकाउंट ओपनिंग फॉर्म, कैश जमा और निकासी की रसीदें तथा GST और उद्यम से संबंधित दस्तावेज भी मिले हैं। पुलिस अब बरामद दस्तावेजों और मोबाइल फोन में मिले डिजिटल डेटा को खंगालकर इस नेटवर्क की पूरी कड़ी जोड़ने में जुटी है।पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल के अनुसार, गिरोह का तरीका लोगों को निवेश के नाम पर अधिक मुनाफे का लालच देने से शुरू होता था। भरोसा कायम करने के बाद उनसे रकम कथित फर्जी कंपनियों या उनसे जुड़े बैंक खातों में जमा कराई जाती थी। इसके बाद रकम को एक खाते से दूसरे खाते में ट्रांसफर करने का सिलसिला शुरू होता था। पुलिस का दावा है कि सीधे बैंकिंग ट्रेल को छिपाने के लिए रकम को अलग-अलग खातों और गेमिंग प्लेटफॉर्म के जरिए भी घुमाया जाता था। यानी पैसा एक जगह जमा होता और कुछ ही समय बाद कई रास्तों से आगे बढ़ा दिया जाता। इसी पैटर्न ने पुलिस की जांच को बैंक खातों और डिजिटल ट्रांजैक्शन की तरफ मोड़ा। 14 बैंकों के 72 खातों की जांच में करीब 5600 करोड़ रुपये के संदिग्ध ट्रांजैक्शन सामने आने के बाद जब इनका NCRP रिकॉर्ड से मिलान किया गया तो देशभर में दर्ज 86 साइबर अपराध की शिकायतों से कनेक्शन सामने आया। पुलिस अब इन ट्रांजैक्शन की परत-दर-परत जांच कर रही है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कुल 5600 करोड़ रुपये के लेन-देन में कितनी रकम वास्तविक साइबर ठगी से जुड़ी है और कितनी रकम नेटवर्क में सिर्फ ट्रांसफर या रूट की गई।
कानपुर साइबर पुलिस ने फर्जी फर्मों और बैंक खातों के जरिए निवेश के नाम पर ठगी करने वाले एक अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश किया

