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बिहार में मॉब लिंचिंग में मारे गए अथहर हुसैन की पत्नी की दरखास्त पर जमीयत उलमा-ए-हिंद की कानूनी सहायता समिति इस मामले में कानूनी मदद उपलब्ध कराने के लिए आगे आई है। इस प्रकरण में जमीयत हस्तक्षेपकर्ता (इंटरवीनर) के रूप में याचिका दायर करेगी। इसी सिलसिले में जमीयत उलमा-ए-हिंद की लीगल टीम अनुभवी आपराधिक वकीलों का एक विधिवत पैनल गठित कर रही है, ताकि पीड़ित परिजनों को न केवल न्याय दिलाया जा सके, बल्कि हत्यारों को उनके किए की सख्त सजा तक पहुँचाया जा सके।

जमीयत उलेमा हिंद के नेता मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि नालंदा में एक गरीब फेरीवाले अथहर हुसैन को नाम और मजहब पूछकर मार डाला गया तो अब देश का पक्षपाती मीडिया चुप क्यों है? क्या इसलिए कि मरने वाला मुसलमान है? यह दोहरा चरित्र क्यों?
ज़ुल्म, ज़ुल्म ही होता है,वह न हिंदू होता है, न मुसलमान। अगर हम इंसान होने का दावा करते हैं, तो हमें हर तरह के ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त हिदायतों के बावजूद ऐसे घटनाक्रमों का होना इस बात का प्रमाण है कि ऐसे कृत्य करने वालों को राजनीतिक संरक्षण और समर्थन प्राप्त है, इसी कारण उनके हौसले बुलंद हैं।
मॉब लिंचिंग सांप्रदायिक तत्वों की नफरत भरी राजनीति का नतीजा है, जो देश में खुलेआम की जा रही है।

इन हालात में मायूस होने की जरूरत नहीं है। अगर इरादे मजबूत हों, तो निराशा के अंधेरों से उम्मीद की नई शमा रोशन हो सकती है, क्योंकि इस देश की मिट्टी में मोहब्बत का खमीर शामिल है।

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