याचिकाकर्ताओं में मोहम्मद कासिम अहमद समेत चार ऐप आधारित कैब चालक शामिल हैं। उनका कहना है कि यह नियम संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मिले उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। साथ ही, यह मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के भी खिलाफ है, क्योंकि इस कानून में ड्राइविंग लाइसेंस के लिए किसी भाषा की अनिवार्यता निर्धारित नहीं की गई है।
याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई है कि लाखों गरीब और प्रवासी चालकों के बैज निलंबित किए जा सकते हैं और परमिट रद्द हो सकते हैं, जिससे उनकी आजीविका पर गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा। जनहित याचिका में महाराष्ट्र के करीब 9.65 लाख चालकों को होने वाली परेशानी को रोकने के लिए अधिसूचना पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई है।मराठी भाषा अनिवार्य किए जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका के मामले को तत्काल निर्देशों के लिए बुधवार को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (ACJ) रविंद्र घुगे की पीठ के समक्ष मेंशन किया जाएगा। हालांकि, एसीजे रवींद्र घुगे, जिन्हें कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर स्थानांतरित किए जाने की सिफारिश की गई है, ने हाल ही में कहा था कि पीठ कोई नया मामला नहीं सुनेगी।महाराष्ट्र में ऑटो रिक्शा और कैब चालकों के लिए मराठी भाषा अनिवार्य किए जाने को लेकर विवाद लगातार जारी है। मराठी भाषा अनिवार्य किए जाने के खिलाफ ऑटो रिक्शा और कैब चालकों ने बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया है। मंगलवार को बॉम्बे हाई कोर्ट में अधिवक्ता विवेक शुक्ला के माध्यम से एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। याचिका में महाराष्ट्र सरकार द्वारा 12 अगस्त 2026 को जारी उस अधिसूचना को चुनौती दी गई है, जिसमें ऑटो रिक्शा, टैक्सी और ऐप आधारित कैब चालकों के लिए मराठी भाषा का कार्यसाधक ज्ञान अनिवार्य किया गया है।

